कभी सोचती हूँ, कि तुम्हें शब्दों में बाँध के कागज़ पे लिखूँ
या लिखी हुई
कविता को बस दिल में ही छुपा लूँ
या तुम्हें सुरों में पिरोके, गीतों की माला बनाऊँ?
या तुम्हारे नाम के गीत अपने होठों पे सजाऊँ?
या कैद कर लूँ तुम्हें हमेशा के लिए दिल में मेरे?
या आज़ाद
पंछी की तरह उड़ने दूँ?
तो गर दूर जाने की बात करो तुम, तो कसम देके रोक लूँ?
या वादा करूँ इंतज़ार का, और आँसुओं को भी छुपा लूँ?
पर क्या है ना… दिल जानता है, ना कैद कर सकते हैं तुम्हें,
ना छोड़ सकते हैं अब ना रोक सकते हैं तुम्हें, ना तो
बुला सकते हैं अब
पर मेरी हर नज़्म और हर गीत में, हम यूँ ही मिलते रहेंगे,
तुम बनके स्याही मेरे कागज़ पे, उम्र भर खिलते रहोगे।
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